शिक्षा को लेकर डॉ. बी.आर. आंबेडकर का दृष्टिकोण केवल साक्षरता तक सीमित नहीं था, बल्कि वे इसे ‘मानसिक मुक्ति’ का जरिया मानते थे। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने औरंगाबाद (महाराष्ट्र) की ऐतिहासिक धरती पर ‘मिलिंद महाविद्यालय’ की स्थापना की। यह केवल एक कॉलेज नहीं, बल्कि आधुनिक भारत में वंचित वर्गों के लिए ज्ञान का पहला बड़ा द्वार था।
1. स्थापना की पृष्ठभूमि और ‘नागसेनवन’ का चयन
1940 के दशक में मराठवाड़ा क्षेत्र शैक्षणिक रूप से अत्यंत पिछड़ा हुआ था। वहां के शोषित और दलित समाज के पास उच्च शिक्षा के कोई साधन नहीं थे। डॉ. आंबेडकर ने इस अभाव को समझा और 8 जुलाई 1945 को ‘पीपुल्स एजुकेशन सोसाइटी’ (PES) की स्थापना की।
मिलिंद महाविद्यालय के लिए औरंगाबाद की पहाड़ियों के बीच एक विशाल क्षेत्र चुना गया, जिसे ‘नागसेनवन’ नाम दिया गया। यह नाम प्रसिद्ध बौद्ध भिक्षु ‘नागसेन’ के नाम पर रखा गया था, जिन्होंने ग्रीक राजा ‘मिलिंद’ (मिनांडर) के दार्शनिक प्रश्नों के उत्तर दिए थे।
2. मिलिंद नाम के पीछे का तर्क (Philosophy of Name)
डॉ. आंबेडकर ने इस कॉलेज का नाम ‘मिलिंद’ बहुत सोच-समझकर रखा था। इतिहास में राजा मिलिंद और भिक्षु नागसेन के बीच हुआ संवाद (मिलिंदपन्हो) तर्क, प्रश्न और वैज्ञानिक खोज का प्रतीक है। बाबासाहेब चाहते थे कि इस महाविद्यालय के छात्र भी केवल रट्टा न मारें, बल्कि राजा मिलिंद की तरह तर्कशील और जिज्ञासु बनें।
3. ऐतिहासिक नींव और संघर्ष
● शिलान्यास: मिलिंद महाविद्यालय की आधारशिला (Foundation Stone) 1 सितंबर 1951 को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद द्वारा रखी गई थी।
● श्रमदान: इस कॉलेज के निर्माण में एक अनोखी बात यह थी कि इसके निर्माण के लिए समाज के आम लोगों और मजदूरों ने ‘श्रमदान’ किया था।
इसका प्राथमिक उद्देश्य अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ों को विज्ञान, कला और वाणिज्य की ऐसी शिक्षा देना था जो उन्हें विश्व स्तर पर खड़ा कर सके।
4. एक वैचारिक केंद्र के रूप में विकास
मिलिंद महाविद्यालय ने केवल स्नातक पैदा नहीं किए, बल्कि समाज को विचारक और क्रांतिकारी दिए।
● सामाजिक आंदोलन: 1970 के दशक में उभरे ‘दलित पैंथर’ आंदोलन की वैचारिक जड़ें इसी कैंपस से जुड़ी थीं।
● साहित्यिक क्रांति: यहाँ से ‘दलित साहित्य’ की एक नई धारा निकली जिसने भारतीय साहित्य के पुराने ढांचों को चुनौती दी।
● वैज्ञानिक दृष्टिकोण: कॉलेज में आधुनिक प्रयोगशालाओं और पुस्तकालयों पर जोर दिया गया ताकि छात्र अंधविश्वासों से मुक्त होकर वैज्ञानिक सोच अपना सकें।
5. डॉ. आंबेडकर का विजन: शिक्षा बनाम राजनीति
जैसा कि बाबासाहेब ने 1949 में औरंगाबाद के ही एक भाषण में कहा था, “राजनीति से जीवन के सभी सवाल हल नहीं होते, शिक्षा ही एकमात्र महत्वपूर्ण बात है।” मिलिंद महाविद्यालय इसी विचार का जीवंत रूप है। उन्होंने अपनी निजी लाइब्रेरी की हजारों दुर्लभ पुस्तकें भी इस संस्थान के विकास के लिए समर्पित की थीं।
प्रामाणिक स्रोत (Source for Reference)
इस लेख के तथ्य निम्नलिखित आधिकारिक रिकॉर्ड्स से लिए गए हैं:
● पीपुल्स एजुकेशन सोसाइटी (PES) के आधिकारिक दस्तावेज।
● डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर: राइटिंग्स एंड स्पीचेस (BAWS), महाराष्ट्र सरकार प्रकाशन।
● मिलिंद महाविद्यालय की वार्षिक स्मारिकाएं (Souvenirs) और ऐतिहासिक आर्काइव्स।
मुझे डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के राइटिंग एंड स्पीचेस पढ़ते समझ जब मिलिंद महाविद्यालय के बारे में जाना तो मैंने इसका पूरा इतिहास ढूंढने की कोशिश की और मैंने सीखा कि डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर द्वारा बोया गया ‘शिक्षा’ का यह बीज आज एक विशाल वटवृक्ष बन चुका है। मिलिंद महाविद्यालय आज भी केवल एक शिक्षण संस्थान नहीं, बल्कि हज़ारों युवाओं के लिए आत्मसम्मान और पहचान का प्रतीक है।
वर्तमान में भी यह संस्थान विशेष रूप से ग्रामीण और वंचित पृष्ठभूमि से आने वाले उन हज़ारों छात्रों का भविष्य संवार रहा है, जिनके पास बड़े शहरों के महंगे संस्थानों में जाने के साधन नहीं हैं। ‘नागसेनवन’ का यह परिसर आज भी डॉ. आंबेडकर के उस वैज्ञानिक और तार्किक दृष्टिकोण को जीवित रखे हुए है, जो छात्र को केवल एक डिग्रीधारी नहीं, बल्कि एक जागरूक नागरिक बनाने पर जोर देता है।
अंततः, मिलिंद महाविद्यालय का इतिहास हमें याद दिलाता है कि राजनीतिक सत्ता से कहीं अधिक स्थायी और प्रभावशाली ‘बौद्धिक क्रांति’ होती है, और उस क्रांति का एकमात्र रास्ता ‘शिक्षा’ के गलियारों से होकर गुजरता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. मिलिंद महाविद्यालय की स्थापना किसने और कब की थी?
मिलिंद महाविद्यालय की स्थापना डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने 8 जुलाई 1945 को ‘पीपुल्स एजुकेशन सोसाइटी’ (PES) के माध्यम से की थी। इसका औपचारिक शिलान्यास 1 सितंबर 1951 को हुआ था।
2. इस महाविद्यालय का नाम ‘मिलिंद’ क्यों रखा गया?
यह नाम बौद्ध इतिहास के प्रसिद्ध राजा मिलिंद (मिनांडर) के नाम पर रखा गया है। डॉ. आंबेडकर चाहते थे कि छात्र राजा मिलिंद की तरह तर्कशील (Rational) और जिज्ञासु बनें, जिन्होंने प्रसिद्ध भिक्षु नागसेन से गहरे दार्शनिक प्रश्न पूछे थे।
3. मिलिंद महाविद्यालय कहाँ स्थित है?
यह महाविद्यालय महाराष्ट्र के औरंगाबाद (अब छत्रपति संभाजीनगर) में स्थित है। यह पूरा परिसर ‘नागसेनवन’ के नाम से जाना जाता है।
4. डॉ. आंबेडकर ने इस कॉलेज की स्थापना क्यों की थी?
इसका मुख्य उद्देश्य मराठवाड़ा जैसे पिछड़े क्षेत्रों के दलितों, आदिवासियों और अन्य शोषित वर्गों को उच्च और वैज्ञानिक शिक्षा उपलब्ध कराना था, ताकि वे मानसिक गुलामी से मुक्त होकर समाज में बराबरी का स्थान पा सकें।
5. क्या मिलिंद महाविद्यालय का संबंध किसी सामाजिक आंदोलन से रहा है?
हाँ, मिलिंद महाविद्यालय का कैंपस 1970 के दशक के प्रसिद्ध ‘दलित पैंथर’ आंदोलन और ‘दलित साहित्य’ क्रांति का मुख्य केंद्र रहा है। यहाँ की वैचारिक पृष्ठभूमि ने कई महान विचारकों और लेखकों को जन्म दिया है।

