(24 जनवरी स्मृति विशेष)
इतिहास अक्सर बड़े मंचों और सुर्ख़ियों में दिखने वाले नामों को दर्ज करता है, लेकिन समाज की वास्तविक नींव उन लोगों से बनती है जो बिना प्रचार, बिना शोर और बिना व्यक्तिगत लाभ की आकांक्षा के अपना जीवन जनकल्याण में समर्पित कर देते हैं।
डॉ. अब्दुर रज़्ज़ाक़ अंसारी ऐसे ही व्यक्तित्व थे।
24 जनवरी 1917 को जन्मे अब्दुर रज़्ज़ाक़ अंसारी झारखंड (तत्कालीन छोटानागपुर) के सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक विकास के उन स्तंभों में शामिल थे, जिनका प्रभाव आज भी संस्थाओं और लोगों के जीवन में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
संघर्ष से शिक्षा तक की यात्रा
अब्दुर रज़्ज़ाक़ अंसारी का बचपन अत्यंत साधनहीन परिस्थितियों में बीता। कम उम्र में ही उन्हें अपने परिवार द्वारा बुने गए कपड़ों को लगभग 20 किलोमीटर दूर बाज़ार तक ले जाकर बेचने का कार्य करना पड़ता था।
शिक्षा की प्रबल इच्छा के बावजूद उनके पास नियमित पढ़ाई के साधन नहीं थे।
कपड़े बेचने के बाद वे एक स्थानीय स्कूल के गेट पर खड़े होकर कक्षाओं को देखते रहते थे। एक दिन प्रधानाध्यापक ने कारण पूछा, और उनकी पढ़ने की ललक को समझकर विशेष अनुमति दी। यही क्षण उनके जीवन की दिशा बदलने वाला साबित हुआ।
शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बनाना
डॉ. अंसारी का मानना था कि किसी भी समुदाय की प्रगति का मूल आधार शिक्षा है, विशेषकर लड़कियों की शिक्षा।
उनके निजी जीवन का यह पक्ष उल्लेखनीय है कि उन्होंने अपनी पत्नी को शिक्षा के लिए प्रेरित किया और स्वयं पढ़ाया। परिणामस्वरूप उनकी पत्नी न केवल शिक्षित हुईं, बल्कि बाद में शिक्षिका और प्रधानाध्यापिका के रूप में सेवा देकर सेवानिवृत्त हुईं।
इस पहल का असर पूरे क्षेत्र में दिखा और आसपास के गांवों में बालिकाओं की शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ी।
बुनकरों का संगठन और आर्थिक सशक्तिकरण
अब्दुर रज़्ज़ाक़ अंसारी को छोटानागपुर क्षेत्र के बुनकरों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति की गहरी समझ थी। उन्होंने महसूस किया कि व्यक्तिगत संघर्ष से आगे बढ़कर संगठित प्रयास ही स्थायी समाधान दे सकता है।
इसी सोच के तहत उन्होंने बुनकरों के लिए सहकारी आंदोलन की नींव रखी।
बाद में स्थापित छोटानागपुर रीजनल हैंडलूम वीवर्स को-ऑपरेटिव यूनियन लिमिटेड ने हजारों बुनकर परिवारों को रोज़गार, उचित मूल्य और सामाजिक सुरक्षा प्रदान की।
आज भी इस यूनियन से जुड़े लगभग 15,000 बुनकर इसके लाभार्थी हैं।
स्वास्थ्य सेवा को गांव तक लाने की सोच
अपने जीवन के अंतिम चरण में बीमारी के दौरान उन्होंने यह महसूस किया कि आधुनिक चिकित्सा सुविधाएं आम ग्रामीणों की पहुंच से बाहर हैं।
इसी अनुभव से प्रेरित होकर उन्होंने अपने क्षेत्र में एक अस्पताल स्थापित करने की योजना बनाई।
1991 में इस अस्पताल की आधारशिला रखी गई। उनके निधन (14 मार्च 1992) के बाद उनके परिवार ने इस संकल्प को आगे बढ़ाया।
आज यह संस्थान अब्दुर रज़्ज़ाक़ अंसारी मेमोरियल वीवर्स हॉस्पिटल के रूप में कार्यरत है, जहां बुनकरों को न्यूनतम शुल्क पर इलाज और जांच की सुविधा मिलती है।
राजनीति में भूमिका, लेकिन सेवा प्राथमिक
डॉ. अब्दुर रज़्ज़ाक़ अंसारी 1946 से सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रहे। वे सांप्रदायिक राजनीति के विरोधी थे और राष्ट्रीय एकता में विश्वास रखते थे।
स्वतंत्रता के बाद उन्होंने सहकारिता, हस्तकरघा और सामाजिक कल्याण के क्षेत्र में कार्य किया।
वे बिहार विधान परिषद के सदस्य बने और बाद में राज्य सरकार में मंत्री के रूप में भी सेवा दी, लेकिन उनकी पहचान सत्ता से अधिक सेवा और संस्थान निर्माण से बनी।
शैक्षणिक संस्थान और स्थायी विरासत
उन्होंने अपने क्षेत्र में लगभग 17 शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना की।
1938 में स्थापित उनका मिडिल स्कूल आज भी शिक्षा की लौ जलाए हुए है, जो बाद में एक सरकारी विद्यालय के रूप में विकसित हुआ।
उनके द्वारा शुरू किए गए विद्यालय, अस्पताल और सहकारी संस्थाएं यह प्रमाण हैं कि सामाजिक परिवर्तन केवल भाषणों से नहीं, बल्कि दीर्घकालिक संस्थागत प्रयासों से संभव होता है।
ब्लॉग का सार
डॉ. अब्दुर रज़्ज़ाक़ अंसारी का जीवन इस बात का उदाहरण है कि सच्चा समाजसेवी वह होता है जो अपने लिए नहीं, आने वाली पीढ़ियों के लिए संरचनाएं खड़ी करता है।
उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार को जोड़कर एक ऐसा मॉडल प्रस्तुत किया, जिसकी प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है।

