भारतीय राजनीतिक इतिहास में 23 जनवरी की तारीख एक असाधारण दृढ़ता और अटूट प्रतिबद्धता की गवाह है। आज ही के दिन, सन् 1933 में, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर लंदन में आयोजित तीसरे गोलमेज सम्मेलन (Third Round Table Conference) में भाग लेने के बाद ‘गंगे’ (Gange) जहाज से बॉम्बे वापस लौटे थे। बॉम्बे के बंदरगाह पर उनके स्वागत का जो दृश्य था, वह केवल एक नेता की वापसी नहीं थी, बल्कि करोड़ों वंचितों की उस आवाज़ का सम्मान था जिसे वैश्विक स्तर पर पहली बार सुना गया था।
समता सैनिक दल: अनुशासन और वैचारिक स्वागत
जब गंगे जहाज बॉम्बे के तट पर लगा, तो डॉ. आंबेडकर का स्वागत करने के लिए समता सैनिक दल (SSD) के अनुशासित सिपाही वहां तैनात थे। यह स्वागत किसी धार्मिक अनुष्ठान या भावुक अंधभक्ति का परिणाम नहीं था। यह उस तार्किक चेतना का प्रतीक था जिसे बाबासाहेब ने अपने समाज में जगाया था। समता सैनिक दल की मौजूदगी यह दर्शाती थी कि शोषित वर्ग अब संगठित होकर अपने अधिकारों की रक्षा के लिए तैयार है। यह एक अनुशासित और वैज्ञानिक संगठन की पहली झलक थी, जो किसी चमत्कार के भरोसे नहीं बल्कि अपनी सामूहिक शक्ति पर विश्वास करती थी।
राजनीतिक निरंतरता: अकेले, अडिग और अडोल
गोलमेज सम्मेलनों के इतिहास का यदि तुलनात्मक अध्ययन किया जाए, तो डॉ. आंबेडकर की राजनीतिक ईमानदारी और निरंतरता स्पष्ट रूप से उभर कर आती है। इतिहास के तथ्य इस प्रकार हैं:
● तीनों सम्मेलनों में उपस्थिति: डॉ. आंबेडकर एकमात्र ऐसे प्रमुख भारतीय नेता थे जिन्होंने 1930, 1931 और 1932 के तीनों गोलमेज सम्मेलनों में भाग लिया।
● नेताओं की अनुपस्थिति: महात्मा गांधी और मदन मोहन मालवीय जैसे नेता पहले और तीसरे सम्मेलन से दूर रहे। वहीं मोहम्मद अली जिन्ना दूसरे सम्मेलन में अनुपस्थित रहे।
● जहां अन्य नेताओं की भागीदारी राजनीतिक परिस्थितियों और रणनीतियों के अनुसार बदलती रही, वहीं डॉ. आंबेडकर की उपस्थिति ‘अडोल’ रही। उनकी इस निरंतरता का कारण कोई व्यक्तिगत लाभ नहीं, बल्कि हाशिए पर खड़े करोड़ों लोगों के अधिकारों का सवाल था, जिसे वे एक पल के लिए भी अकेला नहीं छोड़ सकते थे।
सत्ता वर्ग बनाम हाशिए की आवाज़
लंदन की उन मेजों पर डॉ. आंबेडकर किसी विशेष सत्ता वर्ग या बहुसंख्यक राजनीति के प्रतिनिधि बनकर नहीं गए थे। वे वहां एक वैज्ञानिक और तार्किक दृष्टिकोण लेकर गए थे कि ‘लोकतंत्र’ का अर्थ केवल बहुमत का शासन नहीं, बल्कि अल्पसंख्यकों और वंचितों की सुरक्षा की गारंटी है। उन्होंने ब्रिटिश सत्ता के सामने निर्भीक होकर यह तर्क रखा कि राजनीतिक आजादी तब तक अधूरी है जब तक कि सामाजिक और आर्थिक आजादी का ढांचा तैयार न हो जाए।
23 जनवरी 1933 को डॉ. आंबेडकर की वापसी एक नए युग की शुरुआत थी। उन्होंने वैश्विक मंच पर यह सिद्ध कर दिया था कि तर्क और तथ्यों के दम पर बड़ी से बड़ी सत्ता को झुकाया जा सकता है। आज जब हम ‘Bahujan Daily’ के माध्यम से इन तथ्यों को देखते हैं, तो हमें यह समझना चाहिए कि हमारा संघर्ष केवल भावनाओं का नहीं, बल्कि संवैधानिक और तार्किक अधिकारों का है। बाबासाहेब का संघर्ष आज भी सामाजिक न्याय की दिशा दिखाने वाला एक वैज्ञानिक दीपस्तंभ है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. डॉ. आंबेडकर किस जहाज से वापस लौटे थे?
वे 23 जनवरी 1933 को ‘गंगे’ (Gange) नामक जहाज से लंदन से बॉम्बे वापस आए थे।
2. गोलमेज सम्मेलनों में डॉ. आंबेडकर का क्या विशेष रिकॉर्ड है?
वे भारत के उन अत्यंत गिने-चुने नेताओं में से एक थे जिन्होंने तीनों गोलमेज सम्मेलनों (1930-1932) में सक्रिय रूप से भाग लिया और वंचितों का पक्ष रखा।
3. बॉम्बे पहुंचने पर उनका स्वागत किसने किया?
उनका स्वागत ‘समता सैनिक दल’ द्वारा किया गया, जो डॉ. आंबेडकर द्वारा स्थापित एक अनुशासित और वैचारिक संगठन था।
4. अन्य प्रमुख नेता तीनों सम्मेलनों में क्यों नहीं थे?
विभिन्न राजनीतिक कारणों और असहयोग आंदोलनों के कारण कांग्रेस और मुस्लिम लीग के नेता किसी न किसी सम्मेलन से अनुपस्थित रहे, लेकिन डॉ. आंबेडकर ने अपने समाज के हितों के लिए निरंतरता बनाए रखी।

